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शान्ति पर्व
अध्याय १९४
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मनुरु उवाच
गुणात्मकं कर्म वदन्ति वेदा; स्तस्मान्मन्त्रा मन्त्रमूलं हि कर्म |  १६   क
विधिर्विधेय़ं मनसोपपत्तिः; फलस्य भोक्ता तु यथा शरीरी ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति