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शान्ति पर्व
अध्याय १९४
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मनुरु उवाच
रसैर्विय़ुक्तं विविधैश्च गन्धै; रशव्दमस्पर्शमरूपवच्च |  २३   क
अग्राह्यमव्यक्तमवर्णमेकं; पञ्चप्रकारं ससृजे प्रजानाम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति