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शान्ति पर्व
अध्याय १९४
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भीष्म उवाच
प्रजापतिं श्रेष्ठतमं पृथिव्यां; देवर्षिसङ्घप्रवरो महर्षिः |  ३   क
वृहस्पतिः प्रश्नमिमं पुराणं; पप्रच्छ शिष्योऽथ गुरुं प्रणम्य ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति