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शान्ति पर्व
अध्याय १९४
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भीष्म उवाच
ऋक्सामसङ्घांश्च यजूंषि चाहं; छन्दांसि नक्षत्रगतिं निरुक्तम् |  ८   क
अधीत्य च व्याकरणं सकल्पं; शिक्षां च भूतप्रकृतिं न वेद्मि ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति