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वन पर्व
अध्याय १९४
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मार्कण्डेय़ उवाच
स एवमुक्तो राजर्षिरुत्तङ्केनापराजितः |  १   क
उत्तङ्कं कौरवश्रेष्ठ कृताञ्जलिरथाव्रवीत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति