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वन पर्व
अध्याय १९४
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मार्कण्डेय़ उवाच
स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम् |  ११   क
नाभ्यां विनिःसृतं तत्र यत्रोत्पन्नः पितामहः |  ११   ख
साक्षाल्लोकगुरुर्व्रह्मा पद्मे सूर्येन्दुसप्रभे ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति