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वन पर्व
अध्याय १९४
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मार्कण्डेय़ उवाच
कस्यचित्त्वथ कालस्य दानवौ वीर्यवत्तरौ |  १३   क
मधुश्च कैटभश्चैव दृष्टवन्तौ हरिं प्रभुम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति