वन पर्व  अध्याय १९४

मार्कण्डेय़ उवाच

विस्मय़ः सुमहानासीन्मधुकैटभय़ोस्तदा |  १६   क
दृष्ट्वा पितामहं चैव पद्मे पद्मनिभेक्षणम् ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति