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वन पर्व
अध्याय १९४
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मार्कण्डेय़ उवाच
वित्रासय़ेतामथ तौ व्रह्माणममितौजसम् |  १७   क
वित्रास्यमानो वहुशो व्रह्मा ताभ्यां महाय़शाः |  १७   ख
अकम्पय़त्पद्मनालं ततोऽवुध्यत केशवः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति