वन पर्व  अध्याय २३

वासुदेव उवाच

स त्वं पुरुषशार्दूल सर्वय़त्नैरिमं प्रभो |  २४   क
जहि वृष्णिकुलश्रेष्ठ मा त्वां कालोऽत्यगात्पुनः ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति