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वन पर्व
अध्याय १९४
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मार्कण्डेय़ उवाच
आवां वरय़ देव त्वं वरदौ स्वः सुरोत्तम |  २०   क
दातारौ स्वो वरं तुभ्यं तद्व्रवीह्यविचारय़न् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति