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वन पर्व
अध्याय १९४
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मार्कण्डेय़ उवाच
विचिन्त्य त्वथ गोविन्दो नापश्यद्यदनावृतम् |  २९   क
अवकाशं पृथिव्यां वा दिवि वा मधुसूदनः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति