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वन पर्व
अध्याय १९४
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मार्कण्डेय़ उवाच
शृणु राजन्निदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप |  ८   क
एकार्णवे तदा घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे |  ८   ख
प्रनष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति