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सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
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सञ्जय़ उवाच
एकसार्थं प्रय़ातौ स्वस्त्वय़ा सह नरर्षभ |  ३०   क
समदुःखसुखौ चैव नावां शङ्कितुमर्हसि ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति