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उद्योग पर्व
अध्याय १९४
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सञ्जय़ उवाच
न हि तावद्रणे पार्थं वाणखड्गधनुर्धरम् |  २१   क
वासुदेवसमाय़ुक्तं रथेनोद्यन्तमच्युतम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति