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उद्योग पर्व
अध्याय १९४
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सञ्जय़ उवाच
अप्रधृष्यमनावार्यमुद्वृत्तमिव सागरम् |  ४   क
सेनासागरमक्षोभ्यमपि देवैर्महाहवे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति