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वन पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
किं त्वस्य सुकृतं कर्म लोका वा के विनिर्जिताः |  १३   क
य एवमुपसम्प्राप्तः स्थानं देवनमस्कृतम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति