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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
अभिगच्छाव सुग्रीवं शैलस्थं हरिपुङ्गवम् |  ६   क
मय़ि शिष्ये च भृत्ये च सहाय़े च समाश्वस ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति