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शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
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रुद्र उवाच
कौतूहलं चापि हि मे एकान्तगमनेन ते |  १८   क
नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति पितामह ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति