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शान्ति पर्व
अध्याय १९५
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मनुरु उवाच
न चक्षुषा पश्यति रूपमात्मनो; न चापि संस्पर्शमुपैति किञ्चित् |  १६   क
न चापि तैः साधय़तेऽथ कार्यं; ते तं न पश्यन्ति स पश्यते तान् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति