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शान्ति पर्व
अध्याय १९५
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मनुरु उवाच
यथा मनुष्यः परिमुच्य काय़; मदृश्यमन्यद्विशते शरीरम् |  १८   क
विसृज्य भूतेषु महत्सु देहं; तदाश्रय़ं चैव विभर्ति रूपम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति