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शान्ति पर्व
अध्याय १९५
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मनुरु उवाच
खं वाय़ुमग्निं सलिलं तथोर्वीं; समन्ततोऽभ्याविशते शरीरी |  १९   क
नानाश्रय़ाः कर्मसु वर्तमानाः; श्रोत्रादय़ः पञ्च गुणाञ्श्रय़न्ते ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति