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शान्ति पर्व
अध्याय १९५
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मनुरु उवाच
चलं यथा दृष्टिपथं परैति; सूक्ष्मं महद्रूपमिवाभिपाति |  २३   क
स्वरूपमालोचय़ते च रूपं; परं तथा वुद्धिपथं परैति ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति