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शान्ति पर्व
अध्याय १९५
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मनुरु उवाच
स्पर्शं तनुर्वेद रसं तु जिह्वा; घ्राणं च गन्धाञ्श्रवणे च शव्दान् |  ४   क
रूपाणि चक्षुर्न च तत्परं य; द्गृह्णन्त्यनध्यात्मविदो मनुष्याः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति