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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
कुवलाश्वस्य धुन्धोश्च युद्धकौतूहलान्विताः |  १७   क
देवगन्धर्वसहिताः समवैक्षन्महर्षय़ः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति