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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
नाराय़णेन कौरव्य तेजसाप्याय़ितस्तदा |  १८   क
स गतो नृपतिः क्षिप्रं पुत्रैस्तैः सर्वतोदिशम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति