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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
अर्णवं खानय़ामास कुवलाश्वो महीपतिः |  १९   क
कुवलाश्वस्य पुत्रैस्तु तस्मिन्वै वालुकार्णवे ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति