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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
अतिष्ठदेकपादेन कृशो धमनिसन्ततः |  २   क
तस्मै व्रह्मा ददौ प्रीतो वरं वव्रे स च प्रभो ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति