वन पर्व  अध्याय १९५

मार्कण्डेय़ उवाच

ततो धुन्धुर्महाराज दिशमाश्रित्य पश्चिमाम् |  २१   क
सुप्तोऽभूद्राजशार्दूल कालानलसमद्युतिः ||  २१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति