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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य वारि महाराज सुस्राव वहु देहतः |  २७   क
तदापीय़त तत्तेजो राजा वारिमय़ं नृप |  २७   ख
योगी योगेन वह्निं च शमय़ामास वारिणा ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति