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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽस्त्रेण दग्ध्वा राजर्षिः कुवलाश्वो महासुरम् |  २९   क
सुरशत्रुममित्रघ्नस्त्रिलोकेश इवापरः |  २९   ख
धुन्धुमार इति ख्यातो नाम्ना समभवत्ततः ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति