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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
देवदानवय़क्षाणां सर्पगन्धर्वरक्षसाम् |  ३   क
अवध्योऽहं भवेय़ं वै वर एष वृतो मय़ा ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति