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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रीतैश्च त्रिदशैः सर्वैर्महर्षिसहितैस्तदा |  ३०   क
वरं वृणीष्वेत्युक्तः स प्राञ्जलिः प्रणतस्तदा |  ३०   ख
अतीव मुदितो राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति