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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
दद्यां वित्तं द्विजाग्र्येभ्यः शत्रूणां चापि दुर्जय़ः |  ३१   क
सख्यं च विष्णुना मे स्याद्भूतेष्वद्रोह एव च |  ३१   ख
धर्मे रतिश्च सततं स्वर्गे वासस्तथाक्षय़ः ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति