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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
कुवलाश्वस्तु नृपतिर्धुन्धुमार इति स्मृतः |  ३६   क
नाम्ना च गुणसंय़ुक्तस्तदा प्रभृति सोऽभवत् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति