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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
इदं तु पुण्यमाख्यानं विष्णोः समनुकीर्तनम् |  ३८   क
शृणुय़ाद्यः स धर्मात्मा पुत्रवांश्च भवेन्नरः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति