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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवं भवतु गच्छेति तमुवाच पितामहः |  ४   क
स एवमुक्तस्तत्पादौ मूर्ध्ना स्पृश्य जगाम ह ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति