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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
समुद्रो वालुकापूर्ण उज्जानक इति स्मृतः |  ७   क
आगम्य च स दुष्टात्मा तं देशं भरतर्षभ |  ७   ख
वाधते स्म परं शक्त्या तमुत्तङ्काश्रमं प्रभो ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति