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उद्योग पर्व
अध्याय १९५
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वैशम्पाय़न उवाच
यद्युगान्ते पशुपतिः सर्वभूतानि संहरन् |  १३   क
प्रय़ुङ्क्ते पुरुषव्याघ्र तदिदं मय़ि वर्तते ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति