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वन पर्व
अध्याय २७७
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अश्वपतिरु उवाच
अपत्यार्थः समारम्भः कृतो धर्मेप्सय़ा मय़ा |  १४   क
पुत्रा मे वहवो देवि भवेय़ुः कुलभावनाः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति