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शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
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वैशम्पाय़न उवाच
जाय़मानं हि पुरुषं यं पश्येन्मधुसूदनः |  ६८   क
सात्त्विकस्तु स विज्ञेय़ो भवेन्मोक्षे च निश्चितः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति