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वन पर्व
अध्याय ४८
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सञ्जय़ उवाच
एते चान्ये च वहवो ये च ते भरतर्षभ |  २२   क
आगतानहमद्राक्षं यज्ञे ते परिवेषकान् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति