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शान्ति पर्व
अध्याय १९६
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मनुरु उवाच
न चक्षुषा पश्यति रूपमात्मनो; न पश्यति स्पर्शमिन्द्रिय़ेन्द्रिय़म् |  ४   क
न श्रोत्रलिङ्गं श्रवणे निदर्शनं; तथागतं पश्यति तद्विनश्यति ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति