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शान्ति पर्व
अध्याय १९६
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मनुरु उवाच
श्रोत्रादीनि न पश्यन्ति स्वं स्वमात्मानमात्मना |  ५   क
सर्वज्ञः सर्वदर्शी च क्षेत्रज्ञस्तानि पश्यति ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति