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वन पर्व
अध्याय १९६
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वैशम्पाय़न उवाच
ये च क्रूरेषु सर्वेषु वर्तमाना जुगुप्सिताः |  ११   क
स्वकर्म कुर्वन्ति सदा दुष्करं तच्च मे मतम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति