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वन पर्व
अध्याय १९६
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मार्कण्डेय़ उवाच
नैव यज्ञः स्त्रिय़ः कश्चिन्न श्राद्धं नोपवासकम् |  २०   क
या तु भर्तरि शुश्रूषा तय़ा स्वर्गमुपाश्नुते ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति