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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
भ्रान्तसर्वमहाभूतमावर्जितदिवाकरम् |  १९   क
त्रैलोक्यमभिसन्तप्तं ज्वराविष्टमिवातुरम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति