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शान्ति पर्व
अध्याय २२८
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व्यास उवाच
तरत्येव महादुर्गं जरामरणसागरम् |  ७   क
एवं ह्येतेन योगेन युञ्जानोऽप्येकमन्ततः |  ७   ख
अपि जिज्ञासमानो हि शव्दव्रह्मातिवर्तते ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति