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शान्ति पर्व
अध्याय १९७
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मनुरु उवाच
यथा व्यक्तमिदं शेते स्वप्ने चरति चेतनम् |  १   क
ज्ञानमिन्द्रिय़संय़ुक्तं तद्वत्प्रेत्य भवाभवौ ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति