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शान्ति पर्व
अध्याय १९७
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मनुरु उवाच
यथाम्भसि प्रसन्ने तु रूपं पश्यति चक्षुषा |  २   क
तद्वत्प्रसन्नेन्द्रिय़वाञ्ज्ञेय़ं ज्ञानेन पश्यति ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति